Dr. V. Singh

Secretary, Vedic Mohan Ashram, Haridwar
Director, Public Schools, DAVCMC, New Delhi

।। यद्यादाचरति श्रेश्ठस्ततदेवतरो जनः। ।।

स यत्प्रमाणं कुरूत लोकस्तदनुवर्ततै।।

सत्संस्कारों से परिमार्जित वे कर्म जो समाज के हित में किए जाते हैं वे मानवता की रक्षा में किए जाने के कारण समाज के लिए आदर्ष और करणीय हो गये हैं, ‘‘संस्कृति में ही समाहित होते है।’’ श्रेश्ठ पुरूश जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरूश भी वैसा ही आचरण करते हैं। श्रेश्ठ पुरूश जैसा प्रमाण प्रस्तुत करता है, मानव समुदाय भी वैसा ही आचरण करने लगता है। ऐसा ही श्रेश्ठ सामाजिक आदर्ष कालावधि में संस्कृति कहलाता है।

उत्तम संस्कारों से युक्त व्यक्ति के सत्यं-षिवं-सुन्दरं विचारों की कर्ममयी अभिव्यक्ति जब सामूहिक रूप से होने लगती है, तो वही संस्कृति बन जाती है। संस्कार व्यक्तिगत होते हैं जबकि संस्कृति सामूहिक होती है। संस्कृति समाज का स्थायी तत्व है। वैदिक काल से पौराणिक काल तक और बौद्वकाल से आज तक प्रवाहमान इस संस्कृति में कुछ अन्तर भले ही दिखाई दे ; किन्तु मूल चेतना नहीं बदलती। हम वैदिक संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं।

‘प्रयोजनमनुद्दिष्य मंदः अपि न प्रवर्तते।’ कार्य-कुषलता कार्य के कर्ता पर निर्भर होती है। किसी भी श्रेश्ठ कार्य की परिणति कर्ता को षुभकामना एवं बधाइयों का पात्र बनाती है। लौकिक व्यवहारानुसार कर्ता को उसके द्वारा कृत कार्यों की प्रतिपुश्टि उसे उत्साहित करती है। ये उत्साह ही उसे एतद् प्रकारक कार्य करने के लिए निरंतर प्रेरित करता है। सदर्थों में प्रेरित मानव के कार्य समाज में आदर्ष बन जाते हैं। एक प्रतिमान के रूप स्वरूप को प्रकाषित एवं स्थापित करने के लिए एक सर्वहित मार्ग प्रषस्त करती है।

अस्तु-कोरोना दुरावस्था से उठता समाज और अन्य आवष्यक व्यवस्थाएँ यथासंभव, यथासमय, यथास्थिति अनुकूल और प्रतिकूल होती रहीं। समय-समय पर आवष्यक निर्देषों का अपरिहार्यतया पालन संजीवनीवत् रहा। ऐसी विकट परिस्थितियाँ जहाँ लोक व्यवहार को बाधित कर रही थीं, वहीं षिक्षक षिक्षा के द्वारा समाज निर्माण के अनुश्ठान में संलग्न रहा। इसी कार्य का परिणाम है कि आभासीय रूप से विद्यालयीय छात्र-छात्राओं ने विषिश्ट योग्यताएँ प्रदर्षित कीं, जिसका वार्शिक विवरण यहाँ इस ‘अक्षुण्ण’ नामक पत्रिका में देखने को मिला।

।। इति शुभम् ।।

ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।। ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।। ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।।
ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।। ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।। ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।।