Arya Ratan Dr. Punam Suri

President, Vedic Mohan Ashram Trust, Haridwar
DAV College Managing Committee, New Delhi
Arya Pradeshik Pratinidhi Sabha, New Delhi
Chancellor, DAV University, Jalandhar, Punjab

।। तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु (यजुर्वेद) ।।

(हमारा मन कल्याणकारी शुभसंकल्पों वाला हो)

परमपिता परमात्मा की यह सुंदर सृष्टि अत्यंत गूढ़ व अनुपम है। इस सृष्टि में जैविक एवं अजैविक नामक दो संघटक है, जिनके अंतर्गत विभिन्न प्राणियों, वृक्ष वनस्पतियों के समूह है। जैविक संघटक में सबसे प्रबुद्ध जीव एवं परमात्मा की अभूतपूर्व रचना ‘‘मनुष्य‘‘ है। मनुष्य अपने समस्त क्रिया कलाप अंतर्मन में निहित पूर्व संस्कारों के आधार पर करता है। ये संस्कार उसके व्रत एवं उद्देश्यों को संकल्प एवं विकल्प रूप में स्थापित कर यथासमय, यथापरिस्थिति, यथाव्यवहार एवं यथावातावरण प्रस्फुटित होकर प्रकट होते है। मन में संचालित योजना एवं परियोजनाओं का सातत्य, नैरंतर्य ही व्रत व उद्देश्य को विकल्प रहित संकल्प में परिवर्तित करता है। आर्य समाज के संस्थापक ऋषिवर देव दयानन्द जी ऐसे ही संकल्पों के धनी थे। संकल्पों की महानता ही व्यक्तित्व को महान बनाती है। जब इस धराधाम पर चतुर्दिक नास्तिकता का प्रलयंकारी तांडव नृत्य हो रहा था। वेदविद्या विलुप्तता की पराकाष्ठा को प्राप्त हो रही थी। तब महान कर्मयोगी ऋषिवर देव दयानन्द जी ने देवभूमि हरिद्वार के वास्तविक देवत्व के विकास हेतु सप्त सरोवर स्थित ‘भूपतवाला‘ नामक स्थान पर, कुम्भ मेले के स्वर्णिम अवसर पर, पाखण्ड खंडिनी ध्वजा स्थापित कर, वास्तविक वेदज्ञान का प्रचार प्रसार किया। ऋषि दयानन्द की तपः पूत अमृतमयी वाक्गंगा का निर्मल प्रवचनरुपी जल, अज्ञान अविद्या, पाखण्ड, अंधविश्वास आदि विविध सामाजिक रोगों का उपचार करने लगा। सप्तसरोवर स्थित वह दिव्य स्थान कालांतर में ‘‘वैदिक मोहन आश्रम‘‘ के नाम से जगविख्यात हुआ।

किन्तु! समाज में कुछ भिन्न प्रकृति एवं विचारधारा के लोग भी विचरण करते है। जिनके उपचार के लिए आचार्य चाणक्य जी ने ‘‘दण्डेनैतान् वशी कुर्यात्‘‘ का आदेश किया है। ऐसे ही कुछ उपद्रवी सामाजिक प्राणियों के द्वारा इस पुण्यभूमि पर अनधिकृत चेष्टा के द्वारा एकाधिकार प्राप्त करने का विचार बनाया था, किन्तु ऋषिवर दयानन्द जी के वास्तविक मानस पुत्र पुत्रियों के सतत अभियोगादि संघर्ष एवं विकल्परहित शिवसंकल्प से यह ऐतिहासिक अलौकिक धरा, दिव्यधरोहर के रूप में सुरक्षित है। वैदिक शिक्षा एवं ओजस्वी संस्कारो के स्वप्नद्रष्टा ऋषिस्वप्नों की पूर्ति हेतु आज उनके मानस पुत्र पुत्रियाँ इस संस्था को विश्वविख्यात बनाने में जुटे है।

कालांतर में यह ज्योतिर्मय पावन संस्था ऋषि दयानंद सहित, महात्मा आनन्द स्वामी जी, महात्मा हंसराज के अद्वितीय तप सेे वैदिक ज्ञान एवं आधुनिक विज्ञान को समन्वित कर प्राच्य एवं अर्वाचीन संस्कृति को प्रकट करने का प्रयास कर रही है ।

ईश्वर से विनम्र प्रार्थना है की हमारा यह शिव संकल्प यथाशीघ्र निर्बाध रूप से पूर्ण हो, जिससे हम ऋषि स्वप्न को साकार कर सके।

।। तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।।

।। इति शुभम् ।।

ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।। ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।। ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।।
ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।। ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।। ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः ॐ ।।